थियो ने की मंकी बार्स की कोशिश
एक बड़ी चुनौती के लिए छोटे-छोटे कदम
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लाइट बंद होते ही ज़ोई ने अपनी सांस रोक ली।
बारिश की बूंदें खिड़की पर जल्दी-जल्दी टपक रही थीं। दूर कहीं बादलों की गड़गड़ाहट हो रही थी, जैसे पेट में चूहे कूद रहे हों। सितारों और सॉकर वाले उसके पोस्टर अंधेरे में अलग दिख रहे थे। उसकी दीवार पर बड़ी-बड़ी आकृतियां खिंच गई थीं।
ज़ोई ने अपना कंबल ठुड्डी तक खींच लिया। उसने चुपचाप रहने की कोशिश की। उसके बिस्तर के पास वाला लैंप बंद था। केवल उसकी छोटी सी नाइट-लाइट एक हल्के चाँद की तरह चमक रही थी।
उसका दरवाज़ा थोड़ा सा खुला। बाहर की रोशनी अंदर आई। पापा ने अंदर झाँका।
"अरे, ज़ेबरा," उन्होंने धीरे से कहा। "आज रात तूफान के गाने बज रहे हैं। किसी साथी की ज़रूरत है?"
ज़ोई ने बड़ी-बड़ी आँखों से सिर हिलाया।
पापा कालीन पर बैठ गए। उन्होंने अपने घुटने पर एक छोटी सी टॉर्च रखी। "एक राज़ देखना चाहती हो?"
उन्होंने टॉर्च चालू की और उसे दीवार की तरफ किया। उनके हाथ रोशनी के सामने हिले। एक लंबे कानों वाली आकृति रंगीन दीवार पर उछली।
ज़ोई चौंक उठी। "एक खरगोश!"
परछाई वाले खरगोश ने अपनी नाक सिकोड़ी। पापा ने उसे कुदाने के लिए अपने अंगूठे हिलाए। खरगोश ने झुककर अभिवादन किया, और फिर एक तरफ गिर गया।
ज़ोई खिलखिला कर हंस पड़ी। उसकी घबराहट कम हो गई। बादलों की गड़गड़ाहट फिर हुई, लेकिन अब थोड़ी धीमी थी।
"क्या मैं कोशिश कर सकती हूँ?" ज़ोई ने पूछा।
"डायरेक्टर ज़ोई, यह रोशनी लो," पापा ने कहा।
उसने टॉर्च ले ली। पापा के हाथ से यह चिकनी और गर्म लग रही थी। उसने इसे दीवार के पास पकड़ा। खरगोश छोटा हो गया।
उसने रोशनी को पीछे खींचा। खरगोश इतना बड़ा हो गया कि छत को छूने लगा।
"वाह," ज़ोई ने कहा। "पास करने से छोटा होता है। दूर करने से बड़ा होता है।"
"तुम समझ गई," पापा ने कहा। उन्होंने एक नई आकृति बनाई। एक बत्तख मज़ेदार कदमों से चलने लगी।
ज़ोई ने बत्तख की तरह आवाज़ निकाली। बत्तख ने भी वैसी ही आवाज़ दी। उसने खुद एक आकृति बनाने की कोशिश की। दो उंगलियां और एक अंगूठा मिलकर एक भौंकने वाला कुत्ता बन गए।
"अच्छा कुत्ता है," पापा ने कहा। "मुझे लगता है इसे एक दोस्त की ज़रूरत है।"
उन्होंने अपने अंगूठों को फंसाकर अपने हाथों को फैलाया। शानदार सींगों वाला एक मूस (हिरण) दीवार पर छा गया। मूस ने धीरे से शान से अपना सिर झुकाया।
ज़ोई ने ताली बजाई। अब कमरा खाली नहीं लग रहा था। यह एक छोटे से मंच (स्टेज) जैसा लग रहा था।
उन्होंने और भी कोशिशें कीं। एक मछली किताबों की अलमारी के ऊपर तैरने लगी। एक सांप उसके पोस्टर के पास से रेंगता हुआ गया। परछाइयां उसकी ड्रेसर को पार कर गईं और उसके स्टफ्ड भालू (खिलौने) को हाथ हिलाया।
जब पापा ने टॉर्च बंद की, तो दीवार फिर से खाली हो गई। लेकिन ज़ोई की मुस्कान बनी रही। अंधेरा एक शांत गीत की तरह गुनगुना रहा था।
"कल," उसने कहा, "हम एक शो करेंगे। एक असली शो। परछाई वाले जानवरों की परेड।"
पापा ने कालीन पर बैठकर झुककर सिर हिलाया। "मैं टिकट लाऊंगा," उन्होंने कहा।
अगली रात, ज़ोई ने अपना मंच तैयार किया। उसने कागज़ के कटआउट्स को डंडियों पर टेप से चिपकाया। एक शेर, एक कछुआ, एक तितली, और बड़े पैरों वाली एक मज़ेदार चिड़िया। उसके बिस्तर के पास वाला लैंप धीमी और गर्म रोशनी दे रहा था। टॉर्च उसके हाथ में किसी जादुई छड़ी की तरह इंतज़ार कर रही थी।
"मेहमानों का स्वागत है," उसने अपने खिलौनों से फुसफुसाते हुए कहा। "कृपया ताली बजाएं। काटना मना है।"
बारिश रुक गई थी। बाहर झींगुरों की आवाज़ आ रही थी। कमरे में साफ चादरों और क्रेयॉन की महक आ रही थी।
"परेड शुरू होती है!" ज़ोई ने कहा। उसने शेर का कटआउट लैंप के पास रखा। परछाई वाला शेर शांत कदमों से चला। उसने गहरी और मीठी आवाज़ में एक लोरी गाई।
उसने कछुए को दीवार पर चलाया। "कछुए ने कमरा क्यों पार किया?" उसने पूछा।
वह रुकी, फिर एक छोटी सी आवाज़ में जवाब दिया। "दूसरे कालीन तक पहुँचने के लिए!"
ज़ोई अपने ही चुटकुले पर हंस पड़ी। दरवाज़े से देख रहे पापा ने भी अपनी मुस्कान छिपा ली।
तितली खिड़की के पास उड़ने लगी। उसके पंख धीमी सांसों की तरह खुल और बंद हो रहे थे। उसने उसे अपने पोस्टर वाले सितारे पर उतार दिया।
तभी एक नई आकृति दीवार पर रेंगती हुई आई। यह लंबी और बेडौल थी। यह एक दानव की तरह झुकी हुई थी।
ज़ोई का दिल ज़ोर से धड़कने लगा। उसके हाथ सुन्न पड़ गए। एक पल के लिए कमरा तंग लगने लगा।
उसने एक गहरी सांस ली। उसने टॉर्च उठाई, एकदम स्थिर और बहादुर बनते हुए। रहस्यमयी चीज़ पर रोशनी पड़ी।
"ओह," वह बोली और हंसने लगी। "यह तो बस मेरा बैकपैक (बस्ता) है।"
उसने बैकपैक को घुमा दिया। उसकी जेबों से अजीब उभार बन गए। "नया प्लान," उसने परेड से कहा। "माउंट बैकपैक के चारों ओर चलो।"
शेर ने पहाड़ के सामने सिर झुकाया। कछुआ एक पट्टे पर चढ़ा और धीरे से, खुशी-खुशी नीचे फिसल गया। तितली ज़िप पर बैठ गई और हाथ हिलाने लगी।
ज़ोई का आत्मविश्वास बढ़ा। उसने टॉर्च को पास किया, फिर दूर। बड़ा पहाड़। छोटा पहाड़। वह सब कुछ बदल सकती थी।
हफ्ते के अंत तक, ज़ोई सच में एक डायरेक्टर बन गई। उसने एक व्हेल बनाई जो होल-पंच के छेदों से बिंदुओं की फुहार छोड़ती थी। उसने जूते के डिब्बे और टेप से एक ट्रेन बनाई। उसने अपनी छोटी चचेरी बहन माया को दो उंगलियों और एक अंगूठे से भौंकने वाला कुत्ता बनाना सिखाया।
"भौं! भौं!" माया ने आवाज़ निकाली। वे दोनों ज़ोर से हंसे और कालीन पर गिर गए।
एक आखिरी रात, आसमान शांत था। कोई गड़गड़ाहट नहीं। बस पंखे की धीमी आवाज़ आ रही थी। नाइट-लाइट की हल्की चमक में पोस्टर चमक रहे थे।
ज़ोई बिस्तर पर चढ़ी। उसने खुद बड़ी लाइट बंद कर दी। उसने छोटी नाइट-लाइट चालू रहने दी, जैसे शो में कोई मोमबत्ती हो।
उसने दीवार की ओर देखा। वह खाली और शांत थी, इंतज़ार कर रही थी। उसकी उंगलियों ने एक छोटी चिड़िया के पंख फड़फड़ाने का इशारा किया।
"शुभरात्रि, स्टेज," उसने फुसफुसाते हुए कहा।
वह अपने कंबल में दुबक गई। अंधेरा बना रहा, शांत और विचारों से भरा हुआ। वह जानती थी कि अगर वह चाहे, तो कभी भी परेड शुरू कर सकती है।