लूना का नया खेल
खेल के मैदान में हिम्मत और दोस्ती की एक प्यारी सी कहानी
About This Book
सात साल की लूना को सब कुछ जाना-पहचाना ही अच्छा लगता था। हर आधी छुट्टी में वह अपने उन्हीं दोस्तों के साथ स्टापू और पकड़म-पकड़ाई खेलती थी। स्कूल में एक नया लड़का आया था, कबीर, जो व्हीलचेयर पर था और मैदान के किनारे से सबको देखता रहता था। ऐसा नहीं था कि लूना किसी को अलग रखना चाहती थी, बस उसे अपने पुराने खेल ही पसंद थे। एक दिन जब बारिश की वजह से छुट्टी क्लास में ही हुई, तो कबीर अपनी स्लेट लेकर आया और पूछा कि क्या वह सबको 'रंग बदलो' नाम का एक खेल सिखा सकता है। पहले तो लूना ने मुँह बनाया क्योंकि यह खेल रस्सी कूदने और पकड़म-पकड़ाई जैसा नहीं था। कबीर ने समझाया कि कैसे खिलाड़ी रंग-बिरंगी पोटलियों को आगे बढ़ाते हैं और एक रंग का नाम बोलते हैं, ताकि बिना दौड़े सबकी बारी आ सके। यह खेल बरामदे में भी खेला जा सकता था, इसलिए व्हीलचेयर भी आसानी से घेरे में शामिल हो सकती थी। जैसे ही लूना ने यह नया खेल खेला, उसे एहसास हुआ कि जब सब मिलकर खेलते हैं तो कितना मज़ा आता है। उसे समझ आया कि वह बेवजह ही अपनी पुरानी आदतों से चिपकी हुई थी और नए दोस्त बनाने के मौके गँवा रही थी। लूना ने कबीर से माफ़ी माँगी और उसे दूसरे बच्चों को भी यह खेल सिखाने के लिए कहा। उस हफ़्ते के आखिर तक, लूना ने दूसरे खेलों में भी छोटे-छोटे बदलाव करने में मदद की ताकि और भी बच्चे साथ खेल सकें। उसने सीखा कि कुछ नया आज़माना हिम्मत और दोस्ती का काम हो सकता है। कहानी के अंत में, खेल के मैदान में सबकी हँसी गूँज रही थी और लूना को गर्व था कि वह एक ऐसे घेरे का हिस्सा थी जिसमें सब शामिल थे।
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