लैला और अनलेबल्ड एडवेंचर
एक सिटी क्वेस्ट जहाँ हर हिस्से की अहमियत है
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पहले ही दिन सुबह, बडी मेज़ के नीचे छिप गया और बाहर नहीं आ रहा था।
ज़ोई पेट के बल लेट गई और मेज़पोश के नीचे से झाँका। धूल से उसकी नाक में गुदगुदी हुई। बडी की कोमल भूरी आँखें उसे देखकर झपक रही थीं। उसके पंजे कसकर सिकुड़े हुए थे।
"मैं एक गेंद लाई हूँ," उसने फुसफुसाया। उसने गेंद को धीरे से लुढ़काया। वह उसकी कोहनी से टकराकर रुक गई।
मलिक उसके बगल में बैठ गया। "हाय, बडी," उसने धीमी आवाज़ में कहा। "हम अच्छे हैं।" उसकी धारीदार टोपी खिसककर एक कान पर आ गई थी।
अबुएला ने पानी का एक कटोरा नीचे रखा। उससे फर्श पर रोशनी नाचने लगी। "छोटे कदमों से मिलती है बड़ी हिम्मत," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ चाय की तरह गर्म थी। "छोटी शुरुआत करो, बच्चों।"
ज़ोई ने सिर हिलाया। उसका सीना एक वादे से भर गया। वह चाहती थी कि बडी यहाँ सुरक्षित महसूस करे।
ज़ोई ने कागज़ पर एक बड़ा चार्ट बनाया। उसने खाली पंजों के निशान की कई कतारें बनाईं। "हर शांत पल के लिए एक सितारा," उसने मलिक को बताया। उसने चार्ट को एक टैको वाले मैगनेट से फ्रिज पर चिपका दिया।
उन्होंने छोटे-छोटे ट्रीट का एक रास्ता बनाया। एक कुर्सी के पाए के पास। एक ज़ोई के पैर के पास। एक उसकी खुली हथेली पर। वे रसोई के फर्श पर पालथी मारकर बैठ गए। उन्होंने अपनी आवाज़ पत्तियों में सरसराती हवा की तरह धीमी रखी।
बडी ने सूंघा। उसकी नाक एक छोटे इंजन की तरह फड़फड़ाई। उसने अपनी गर्दन आगे बढ़ाई, फिर पहला ट्रीट उठा लिया। क्रंच। उसने इंतज़ार किया। उसने दूसरा उठाया। क्रंच क्रंच। उसके पंजे घोंघे की तरह धीरे-धीरे आगे खिसके।
ज़ोई ने कोई जल्दबाज़ी नहीं की। वह उसकी पूँछ देख रही थी। वह अभी भी शांत थी। "शाबाश," उसने धीरे से कहा। चार्ट पर एक सितारे वाला स्टिकर लग गया। मलिक ने उसके नीचे B-U-D-D-Y लिखा। अक्षर थोड़े टेढ़े-मेढ़े थे।
उन्होंने लिविंग रूम में 'बहादुरी का कोर्स' बनाया। सोफे के कुशन से छोटी-छोटी पहाड़ियाँ बन गईं। दो कुर्सियों और एक कंबल से एक सुरंग बन गई। एक धागे से एक छोटी सी घंटी लटकाई गई थी। वह एक कोमल 'डिंग' की आवाज़ के साथ बजती थी।
"तैयार हो?" मलिक ने पूछा।
ज़ोई ने पहले कुशन के पास एक ट्रीट पकड़ा। "बस एक कदम," उसने कहा। बडी रेंगकर ऊपर चढ़ा, फिर नीचे कूद गया। डिंग! जब उसकी नाक घंटी से टकराई तो वह बज उठी।
बडी ने घंटी को देखकर पलकें झपकाईं, फिर उसे दोबारा सूंघा। डिंग। उसे छींक आ गई, और ज़ोई और मलिक खिलखिलाकर हँस पड़े। दरवाज़े पर खड़ी अबुएला ने तालियाँ बजाईं। चार्ट पर एक और सितारा लग गया।
हर दिन, बडी थोड़ा और बहादुर होता गया। वह खिड़की के पास अपना नाश्ता खाने लगा। वह बिना छिपे झाड़ू को देखने लगा। जब ज़ोई उसका नीला पट्टा बाँधती तो वह पूँछ हिलाता। पूँछ का हिलना छोटा था, पर था ज़रूर।
शनिवार को, पार्क धूप से भरा और बहुत बड़ा था। हवा में कटी हुई घास की महक थी। आसमान में एक पतंग आम की फाँक की तरह चमकीली होकर फड़फड़ा रही थी। हवा में झूलों से चीं-चीं की आवाज़ आ रही थी।
बडी के कान झुक गए। वह पीछे हट गया। पट्टा चिंता की तरह कसा हुआ महसूस हो रहा था।
ज़ोई रास्ते पर घुटनों के बल बैठ गई। उसने बडी को अपनी उंगलियाँ सूंघने दीं। "बहादुर कदम," उसने फुसफुसाया। "एक कदम। रुको। ट्रीट। मुस्कान।" वह पूरे चेहरे से मुस्कुराई।
मलिक बडी के सामने खड़ा हो गया। उसने अपनी जैकेट एक छोटी ढाल की तरह खोल रखी थी। हवा पहले जैकेट से टकराई। "मैं हूँ न, दोस्त," उसने कहा।
बडी ने एक कदम उठाया। रुका। क्रंच। ज़ोई ने उसके कंधे को सहलाया। उसकी पूँछ थोड़ी ऊपर उठी, जैसे कोई झंडा जाग रहा हो।
वे धीरे-धीरे और लगातार घास तक चले। ज़ोई ने गेंद फेंकी नहीं। उसने उसे एक सोते हुए कछुए की तरह लुढ़काया। बडी ने दो छलाँग लगाकर उसका पीछा किया, फिर तीन। वह उसे अपने मखमली-नरम मुँह में लेकर वापस आया। झूलों से चीं-चीं की आवाज़ आई। पतंग से फड़-फड़ की। बडी ने उधर देखा, फिर वापस ज़ोई को देखा।
"तुम यह कर रहे हो," उसने कहा। एक और मुस्कान। पूँछ का एक और छोटा सा हिलना।
घर लौटते समय, हवा का एक झोंका आया। मलिक की धारीदार टोपी उसके सिर से उड़ गई। वह लुढ़कती हुई झाड़ियों के एक झुंड में जाकर छिप गई।
"मेरी टोपी!" मलिक चिल्लाया। वह वहीं जम गया, फिर उसने ज़ोई की ओर देखा।
ज़ोई ने झाड़ियों की ओर इशारा किया। उसकी आवाज़ शांत और साफ थी। "ढूँढो," उसने कहा, बिल्कुल 'बहादुरी के कोर्स' की तरह।
बडी के कान उसकी ओर मुड़ गए। उसने हवा को सूंघा। वह झाड़ियों तक गया और नीचे देखने लगा। पत्तियाँ उसके शरीर से छूकर श्श्-श्श् की आवाज़ कर रही थीं। उसकी नाक बाईं ओर घूमी, फिर दाईं ओर।
उसने अपना सिर झुकाया और बाहर आ गया। टोपी उसके मुँह में सुरक्षित थी। उसका किनारा थोड़ा गीला था।
मलिक खुशी से चिल्लाया। "बडी! तुम हीरो हो!" उसने बडी को गले लगा लिया। ज़ोई ने इतनी ज़ोर से तालियाँ बजाईं कि उसकी हथेलियों में झुनझुनी होने लगी।
अब बडी का पूरा शरीर पूँछ हिला रहा था। नाक से लेकर पूँछ तक, वह एक खुश नूडल की तरह हिल रहा था।
घर वापस आकर, दरवाज़े में लगा मेल स्लॉट खड़खड़ाया। खट-खट। बडी चौंक गया, फिर उसने ज़ोई को देखा।
उसने फ्रिज पर लगे चार्ट को थपथपाया। उस पर हर जगह सितारे चमक रहे थे। "बहादुर कदम?" उसने फुसफुसाया।
बडी ने एक लंबी, गहरी साँस ली। वह एक-एक सावधान कदम उठाकर दरवाज़े तक गया। उसने फर्श पर पड़े खत को सूंघा। उसने अपनी नाक से उसे छुआ। वह एक फुसफुसाहट की तरह नरम होकर खिसक गया।
ज़ोई ने सबसे चमकीला सितारा चिपकाया। मलिक ने उसके बगल में एक छोटी सी टोपी बना दी। अबुएला ने बडी के सिर के ऊपर चूमा। "बहुत बढ़िया," उन्होंने कहा।
उस रात, ज़ोई बिस्तर में एक किताब पढ़ रही थी। घर एक शांत गीत गुनगुना रहा था। बडी उसके दरवाज़े पर खड़ा सोच रहा था। वह एक बार, दो बार घूमा, फिर उसके पैरों के पास सिमटकर बैठ गया।
ज़ोई तेज़ी से नहीं हिली। उसने अपना हाथ उसकी गर्म पीठ पर रखा। उसकी साँस अंदर और बाहर, अंदर और बाहर चल रही थी।
"बड़ा बहादुरी वाला दिन था," वह बुदबुदाई।
बडी की पूँछ एक बार, धीरे से और भरोसे के साथ ज़मीन पर लगी। और उस कोमल अँधेरे में, वे एक साथ, बहादुरी से आराम कर रहे थे।
एक त्योहार, मिली हुई एक डायरी, और सूर्योदय का एक फैसला
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